Balmukund gupt ka jeevan parichay- बाबू बाल मुकुंद गुप्त का जीवन

अर्पित शर्मा :- Balmukund gupt kon hai: नमस्कार दोस्तों इस लेख में हम आपको बाबू बालमुकुंद गुप्त की जीवन के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें द्विवेदी युग को भारतेंदु युग मैं परिवर्तित करने वाले विशेष कभी माना जाता ...

अर्पित शर्मा :- Balmukund gupt kon hai: नमस्कार दोस्तों इस लेख में हम आपको बाबू बालमुकुंद गुप्त की जीवन के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें द्विवेदी युग को भारतेंदु युग मैं परिवर्तित करने वाले विशेष कभी माना जाता है यह बहुत ही कुशल, निबंधकार,अनुवादक,अच्छे कवि और संपादक थे।

 

इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से देश के प्रेम की व्याख्या की है मैं अपने देश से बहुत प्रेम करते थे और वह मानते थे कि भारतीय हर देश के आदमियों से अलग होते हैं उनके अंदर कुछ ना कुछ ऐसे संस्कार होते हैं जो किसी भी देश के लोगों से उन्हें ऊपर उठा देता है।

 

उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से देश की आजादी के लिए कई संदेश दिए हैं समाज में हो रहे अत्याचारों और कुरीतियों का खुलकर विरोध किया हैबहुत ही होनहार देश भक्त थे और अपने देश के प्रति बहुत लगाव रखते थे बहुत ही सहनशील और अध्ययन सी व्यक्ति थे।

 

आइए आज इसलिए के माध्यम से हम इनके जीवन के बारे में और अधिक जानेंगे जैसे कि इनकी शिक्षा  वैवाहिक जीवन  देश के प्रति भावना सभी के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे अतः इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ें।

Balmukund gupt ka jeevan parichay- बाल मुकुंद गुप्त का जीवन

Balmukund gupt ka jeevan parichay
नाम  बालमुकुंद गुप्त
 जन्म  14 नवंबर 1835 हरियाणा
 पिता का नाम  पूरणमल गोयल
 प्रमुख रचनाएं  शिव शंभू के चिट्ठे चिट्ठे और खत
  मृत्यु  1960
 जीवन आयु  42  साल
 नागरिकता  भारतीय

 

बाबूलाल मुकुंद का जन्म (Balmukund gupt janam)

बाबूलाल मुकुंद का जन्म 14 नवंबर 18 सो 65 ईस्वी में हरियाणा के झज्जर जिले के  की गुड़ियानी गांव में हुआ था बहुत ही साधारण से परिवार में जन्मे थे।

बालमुकुंद की शिक्षा (Balmukund gupt shiksha)

इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव से ही प्राप्त की और 10 वर्ष की आयु में उन्हें  रॉक इन  विद्यालय में दाखिला दिलाया गया वह छात्रावास में बहुत ही अच्छे से रहते थे और सहनशीलता कभी किसी को प्रतिउत्तर नहीं देते थे।

 

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उनकी प्रधानाध्यापक उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे और उन्हें आगे पढ़ाई के लिए प्रेरित करते थे परंतु अचानक से पिता और दादा जी की मृत्यु के बाद उन्हें अपनी शिक्षा को बीच में ही छोड़ना पड़ा और बाद में उन्होंने पढ़ाई शुरू की तो केवल 21 वर्ष की आयु में मिडिल क्लास की परीक्षा ही पास कर पाए।

 

धीरे-धीरे उन्होंने उर्दू भाषा को अच्छी तरह से सीख लिया और कुछ दिनों बाद वह अखबार  ए चुनार एवं कोहिनूर  का संपादन किया इसके बाद उन्होंने लगातार कोशिश करते रहे और  1886 कि पश्चात उन्होंने तीन दैनिक  पेपर भारत मित्र हिंदुस्तान हिंदी  बंगवासी का संपादन किया।

बालमुकुंद का परिवार (Balmukund gupt family)

बालमुकुंद के पिता  कि दादाजी का नाम लाला गोवर्धनदास था इनके पिताजी का नाम  पूरणमल था इनका परिवार उस जमाने में भक्ति राम वालों के नाम से पहचाना जाता था। यह बहुत ही विद्यार्थी थे परंतु अपने परिवार की कठिनाइयों को देखते हुए केवल इन्होंने  कक्षा आठवीं तक ही सही रूप से पढ़ाई की क्योंकि इनकी पिता और दादा जी का निधन हो गया था।

Balmukund gupt वैवाहिक जीवन

बालमुकुंद जी की शादी मात्र 15 वर्ष की आयु में रेवाड़ी की एक बहुत ज्यादा प्रतिष्ठित परिवार  की बेटी अनार देवी से हुआ।

बालमुकुंद गुप्त की रचनाएं

गुप्तजी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों के मन में जगह बनाई हैं इनकी रचनाओं में सबसे ज्यादा पांच संग्रह आते हैं जो कुछ समय पहले प्रकाशित हुए हैं जैसे कि गुप्त निबंध आवली चिट्ठे और खत स्पोर्ट कविताएं शिव शंभू के चिट्ठे आदि। इन सभी पांच संग्रह पर  कई  गद्य और पद्य रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं परेम में भी कई ऐसे 50 से लेकर 60 महत्वपूर्ण निबंध है जो अभी तक अप्रकाशित हैं।

Balmukund gupt साहित्यिक विशेषताएं

भारत के साहित्य मैंने बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना जाता था कहा जाता है कि साहित्य में उनका एक अनूठा ही लेखन था मैं अपनी भाषा मैं हर एक कविता और रचना का निर्माण करते थे जिसके कारण उनकी रचनाएं अपने आप में ही अलंकारिक शैली और समृद्ध भाषा के लिए प्रसिद्ध होती थी।

 

उनकी कविताओं के माध्यम से लोगों के मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम और आजादी के लिए विश्वास प्रगट होता था इन्होंने सबसे अधिक रचनाएं देशभक्ति के लिए की है और कई बार इन्होंने अंग्रेजों की सरकार पर व्यंग्यात्मक लिखें।

 

उन्होंने भगवान शिव के प्रति भक्ति को परिचित कराया है और अपनी भारतीय ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को लोगों तक पहुंचाने के लिए बहुत अधिक प्रयास किए हैं।

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बालमुकुंद को मिलने वाले पुरस्कार (Balmukund gupt Awards)

बालमुकुंद जी को अपनी रचना और कविताओं के माध्यम से कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं और उन्हें भारतेंदु और द्विवेदी युग का प्रमुख कवि माना जाता है।

  • पद्मश्री पुरस्कार
  • भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिया गया था पद्मश्री देश के सिविलियन को सम्मान के रूप में सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है इस पुरस्कार से सम्मानित कर बालमुकुंद जी को साहित्य मैं एक विशेष स्थान दिया गया।
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार इनको सन 1958 में साहित्य अकैडमी के द्वारा साहित्य अकैडमी पुरस्कार दिया गया जो उनकी हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए दिया गया।

बालमुकुंद की भाषा शैली

इन्होंने बहुत ही सरल भाषा में सजीव रूप से अपनी कविताओं का लेखन किया है बालमुकुंद जी उर्दू भाषा के बहुत अच्छे लेखक थे हिंदी भाषा तो बहुत कम आती थी परंतु फिर भी वह है हमेशा हिंदी में और अधिक अच्छा करने की सोचते थे।

 

उनकी कविताओं में विनोद पूर्ण वर्णन ओतप्रोत होते थे और भावनात्मक वर्णन भी छुपे रहते थे वह अपनी लेखनी के माध्यम से भारत में रहने वाली प्रजाति दुखों और कष्टों के बारे में अधिक मात्रा में बताया करते थे।

 

परंतु इस बात से भी अवगत थे कि संसार में हर एक चीज का अंत होता है और दुख के समय निकलने के बाद एक दिन सुख जरूर आता है यदि पराधीनता को सहकर सुख मिले तो वह अनुभव कुछ और ही होता है।

 

गुप्तजी ने अपनी भाषा में कई जगहों पर व्यंग ओं का उपयोग किया है उन्होंने ब्रिटिश के शासक लॉर्ड कर्जन पर एक व्यंग छोड़ते हुए लिखा था आपका पर छूट गया परंतु आपका पीछा नहीं छूटा है।

 

जैसे कि एक अदना क्लर्क जिसे नौकरी छोड़ने के लिए नोटिस दे दिए गए हो परंतु वह समय बहुत ही मुश्किल से निकलता है और कहा था कि कहां तक आप इस पद पर रहना पसंद करेंगे।

 

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इस बात को तो सिर्फ आप ही जानते हैं इन्होंने अपनी भाषा में तत्सम शब्दों के साथ-साथ विदेशी शब्दों का भी प्रयोग किया है और वर्णनात्मक आत्मक व्यंग्यात्मक मर्म बेदी शैली होती थी।

बालमुकुंद की मृत्यु (Balmukund gupt Death)

उन्होंने अपने जीवन का बहुत कम समय दिया और इतने कम समय में ही इन्होंने अपने जीवन को सार्थक बना लिया देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनका जीवन अमूल्य था।

 

इतने पावन और सरल स्वभाव के व्यक्ति ने मात्र 42 साल ही इस पावन धरा पर जिए और 18 सितंबर 1907 में वह भारत वासियों को अलविदा कह गए।

आज आपने सीख

दोस्तों आज के इस लेख में हमने आपको बालमुकुंद गुप्त (Balmukund gupt  Biography) के जीवन परिचय के बारे में विस्तार से सभी जानकारी बताएं है वह भारत के एक महान कवि थे।

 

उन्होंने अपने जीवन में कई प्रकार के ऐसे बड़े काम की है जिन्हें आज उन्हें याद किया जाता है आशा करते दोस्तों हमारे द्वारा दी गई जानकारी से आप खुश होंगे इसी प्रकार और भी जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें कमेंट करें धन्यवाद।

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