Untold story : भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा की मिट्टी ने अनेक वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को ललकारा और देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इन्हीं महान सेनानियों में रेवाड़ी के वीर राव तुलाराम का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
1857 की क्रांति के नायक
जब पूरे भारत में 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भड़का, तब राव तुलाराम ने अपनी सेना के साथ खुलकर अंग्रेजों का सामना किया। उन्होंने न केवल रेवाड़ी बल्कि आसपास के क्षेत्रों को भी अपने नेतृत्व में संगठित किया। इस संघर्ष में उनके साथ राव कृष्ण गोपाल और अन्य सहयोगी भी डटे रहे।
नेतृत्व और संघर्ष
राव तुलाराम ने अपने संघर्ष से ब्रिटिश शासन को गहरी चुनौती दी। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने दक्षिण हरियाणा से लेकर दिल्ली तक अपने कदम बढ़ाए। राव तुलाराम का नेतृत्व सिर्फ हरियाणा तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने राजस्थान और अन्य इलाकों में भी स्वतंत्रता संग्राम को मज़बूती दी।
वे केवल एक योद्धा ही नहीं बल्कि एक संगठक भी थे, जिन्होंने किसानों, जाटों और आम जनता को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनाया। नसीबपुर की लड़ाई में उन्होंने अपनी वीरता का लोहा मनवाया। यह लड़ाई हरियाणा की धरती पर लड़ी गई सबसे अहम लड़ाइयों में से एक थी।
काबुल तक का सफर
ब्रिटिश हुकूमत से संघर्ष करते हुए राव तुलाराम अफगानिस्तान तक पहुँचे। वहाँ से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया। लेकिन 23 सितंबर को काबुल में ही बीमारी के चलते उनका निधन हो गया।
आज भी प्रेरणा का स्रोत
राव तुलाराम को सही मायनों में स्वतंत्रता संग्राम का महानायक कहा जाता है। उनका बलिदान और त्याग आज भी युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा देता है।








